दालचीनी

भारत में दालचीनी के वृक्ष हिमालय तथा पश्चिमी तट पर पाए जाते हैं। इन वृक्षों की छाल दालचीनी के नाम से प्रसिद्ध है। यह रस में तीखी, कड़वी तथा मधुर होती है। उष्ण तीक्ष्ण होने के कारण पाचन करती है और विशेष रूप से कफ का नाश करने वाली है। यह अपने मधुर रस से पित्त का शमन करती है और उष्ण वीर्य होने से वात का शमन करती है अतः यह त्रिदोषनाशक है।
dalchini

 

सावधानी 

दालचीनी खून में पित्त की मात्रा बढ़ाने वाली होती है। दालचीनी के अधिक सेवन से शरीर में गर्मी उत्पन्न होती है। अतः गर्मी के दिनों में इसका लगातार सेवन न करें।

दालचीनी का औषधीय उपयोग 

मुहँ के रोग 

दालचीनी के टुकड़े को चूसने से मुख की दुर्गंध का नाश होता है और मसूढ़े मजबूत होते हैं।

दाँतो का दर्द व दाँतों के कीड़े 

दालचीनी के तेल में भिगोया हुआ रुई का फोहा दाँत की जड़ में रखने से दाँत के दर्द व दाँत के कीड़ों का नाश होता।

पेट के रोग 

दालचीनी, इलायची और तेजपात को समान मात्रा में लेकर मिश्रण बनाएं। इस मिश्रण का एक ग्राम चूर्ण एक चम्मच शहद के साथ सेवन करने से पेट के अनेक विकार जैसे मंदाग्नि, अजीर्ण, पेट का दर्द आदि रोगों में लाभ मिलता है।

सर्दी खाँसी जुकाम 

दालचीनी का एक ग्राम चूर्ण एवं एक ग्राम सितोपलादि चूर्ण एक चम्मच शहद के साथ सेवन करने से सर्दी, खाँसी, जुकाम में तुरंत राहत मिलती है।

दालचीनी कोलेस्ट्रोल की अधिक मात्रा को घटाती है 

दालचीनी खून को शुद्ध करती है। दालचीनी के एक ग्राम चूर्ण को एक गिलास दूध में मिलाकर पीने से खून में उपस्थित कोलेस्ट्रोल की अतिरिक्त मात्रा घटने लगती है।

जोड़ों का दर्द 

दालचीनी का एक ग्राम चूर्ण और दो चम्मच शहद को एक कप गुनगुने पानी में मिलाकर सुबह-शाम प्रतिदिन पीने से जोड़ों के दर्द में लाभ होता है।

वृद्धावस्था 

बुढ़ापे में रक्तवाहिनियां कड़क और रुक्ष होने लगती हैं। तथा उनका लचीलापन कम होने लगता है। एक चने के बराबर दालचीनी का चूर्ण लेकर एक चम्मच शहद में मिलाकर नियमित सेवन करने से बुढ़ापे में होने वाले इन लक्षणों से राहत मिलती है। शरीर में स्फूर्ति बढ़ती है, त्वचा पर झुर्रियां नहीं पड़ती और मेहनत करने पर जल्दी थकान नहीं होती।

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