तुलसी

tulsi

तुलसी एक सर्वपरिचित एवं सर्वसुलभ वनस्पति है. भारतीय धर्म एवं संस्कृति में इसका महत्वपूर्ण स्थान है. केवल भारत में ही नहीं अपितु विश्व के अनेक देशों में भी तुलसी को पूजनीय एवं शुभ माना जाता है.

तुलसी दो प्रकार की होती है – हल्के हरे रंग के पत्ते वाली राम तुलसी कहलाती है और गहरे हरे रंग के पत्तों वाली तुलसी कृष्ण तुलसी कहलाती है.

कृष्ण तुलसी सौंदर्य वर्धक होती है. इसके सेवन से त्वचा के सभी रोग नष्ट हो जाते हैं. तुलसी त्वचा के लिए अद्भुत रूप से लाभकारी होती है. दूषित वायु के शुद्धीकरण में तुलसी का योगदान सर्वाधिक होता है. तुलसी हिचकी, खाँसी, विषदोष व श्वास रोग को नष्ट करती है. तुलसी पित्त को पैदा करती है और वात, कफ और मुंह की दुर्गंध को नष्ट करती है.

तुलसी
तुलसी

स्कंद पुराण व पदम पुराण के अनुसार जिस घर में तुलसी का पौधा होता है, वह घर तीर्थ के समान होता है. वहाँ व्यधिरूपी यमदूत प्रवेश नहीं करते हैं. तुलसी के नियमित सेवन से अम्लपित्त दूर होता है तथा पेचिश कोलाइटिस आदि रोग मिट जाते हैं. सर्दी जुकाम, मोटापा, सिरदर्द आदि में यह लाभदायक होती है. तुलसी का रस, अदरक का रस एवं शहद समान मात्रा में मिलाकर बच्चों को चटाने से विशेषकर उन्हें सर्दी, खाँसी, उल्टी, दस्त और कफ में लाभ होता है.

 

तुलसी किडनी की कार्यशक्ति में वृद्धि करती है. इसके सेवन से विटामिन ए तथा विटामिन सी की कमी दूर होती है. तुलसी की छह सात पत्तियां चबाकर या पीसकर खाने से पेट की बीमारियां नहीं होती.

 

विशेष

तुलसी की पत्तियों में खाद्य वस्तुओं (खाने की चीज) को खराब होने से बचाने का अद्भुत गुण होता है.

 

तुलसी का औषधीय उपयोग

 

त्वचा रोग

त्वचा में सफेद दाग हो जाने पर कृष्ण तुलसी के उपचार से काफी लाभ मिलता है.

 

दाद खाज

तुलसी की पत्तियों को पीसकर इसमें नींबू का रस मिलाकर दाद खाज पर लगाने से दाद खाज मिट जाती है.

 

स्मरण शक्ति व तेज

रोज सुबह खाली पेट तुलसी की छह सात पत्तियों का सेवन करने से स्मरण शक्ति, बल व तेज बढ़ता है.

 

थकान मंदाग्नि

तुलसी के काढ़े में मिश्री मिलाकर पीने से स्फूर्ति आती है, थकावट दूर होती है और जठराग्नि तीव्र होती है.

 

मोटापा व सुस्ती

तुलसी की सात आठ पत्तियों का दही या छाछ के साथ सेवन करने से वजन कम होता है, शरीर सुडौल बनता है दिन भर स्फूर्ति बनी रहती है और रक्त कणों में वृद्धि होती है.

 

उल्टी

तुलसी के साथ आठ पत्तों का रस एक चम्मच अदरक के रस में शहद के साथ लेने से उलटी में लाभ होता है.

 

पेट दर्द

पेट में दर्द होने पर तुलसी की ताजी पत्तियों का दस ग्राम रस पीने से काफी लाभ मिलता है.

 

हिचकी

एक चम्मच तुलसी के रस में नमक मिलाकर सेवन करने से हिचकी आना बंद हो जाता है.

 

बाल झड़ना

एक चम्मच तुलसी का चूर्ण व एक चम्मच सूखे आंवले का चूर्ण रात को पानी में भिगोकर रख दीजिए सुबह इस पानी को छानकर बाल धोने से बालों का झड़ना रूक जाता है और बाल काले हो जाते हैं.

 

विष विकार

किसी भी प्रकार के विष विकार में तुलसी का रस पीने से लाभ होता है. तुलसी का रस लगाने से जहरीले कीड़े ततैया, मच्छर का जहर उतर जाता है.

 

हृदय पुष्टि

शीत ऋतु में तुलसी की छह सात पत्तियों में चार काली मिर्च तथा चार बादाम मिलाकर पीसकर इसका प्रतिदिन सेवन करने से हृदय को शक्ति प्राप्त होती है.

इस प्रकार तुलसी बहुत महत्वपूर्ण वनस्पति है.

 

सावधानी

गर्म प्रकृति दाहवाले व्यक्तियों को ग्रीष्म व शरद ऋतु में तुलसी का सेवन नहीं करना चाहिए. तुलसी के सेवन के डेढ़ दो घंटे बाद तक दूध नहीं लेना चाहिए.

 

अर्श व मस्से के रोगियों को तुलसी व काली मिर्च का सेवन एक साथ नहीं करना चाहिए क्योंकि इनकी तासीर गर्म होती है.

 

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हल्दी

प्राचीन काल से ही भोजन में और घरेलू उपचार के रूप में हल्दी का प्रयोग होता रहा है। अनेक मांगलिक कार्यों में भी हल्दी का प्रयोग किया जाता है।

 

आयुर्वेद के मतानुसार हल्दी कसैली, कड़वी, गरम, उष्णवीर्य, पचने में हल्की, शरीर के रंग को साफ करने वाली, वात-पित्त-कफ नाशक, त्वचा रोग नाशक, खून बढ़ाने वाली, सूजन नष्ट करने वाली, रुचिवर्धक, कृमि नाशक व विषनाशक है। हल्दी कोढ़, घाव, आमदोष, कान के रोग, पुरानी सर्दी आदि को मिटाने वाली है। यह यकृत को मजबूत बनाती है एवं रस, रक्त आदि सब धातुओं पर प्रभावशाली काम करती है।

 

हल्दी का औषधीय उपयोग

 

गुम चोट लगने पर

गुम चोट लग जाने पर एक गिलास दूध में एक चम्मच हल्दी डालकर उबालें इस दूध का सेवन करने से व्यक्ति को चोट से उत्पन्न दर्द में काफी लाभ होता है।

 

सर्दी जुकाम में लाभ

जो काम के कारण जब नाक बंद हो जाती है श्वास लेने में भी कठिनाई होती है तब हल्दी के दोहे को श्वास में लेने से सर्दी जुकाम में तुरंत लाभ मिलता है।

 

हल्दी का धुंआ या नस्य तैयार करने के लिए एक अंगारी पर तीन या चार ग्राम हल्दी डालने से जो धुआं निकलता है उसको सूँघने से बंद नाक खुल जाती है।

 

आमी हल्दी

हल्दी का प्रयोग भोजन में व घरेलू उपचार के रूप में प्रतिदिन होता ही रहता है किंतु आमी हल्दी का प्रयोग सलाद के रूप में भी किया जाता है। आमी हल्दी का रंग सफेद व सुगंध आम के समान होती है।

 

आयुर्वेद के मतानुसार आमी हल्दी के गुण व धर्म इस प्रकार हैं

आमी हल्दी कड़वी, तीखी, शीतवीर्य, पित्तनाशक, रूचिकारक, पाचन में हल्की, जठराग्निवर्धक, कफ दोषनाशक एवं सर्दी, खांसी, गर्मी की खांसी, दमा, बुखार, चोट लगने के कारण होने वाली पीड़ा, सूजन तथा मुंह के रोगों में लाभदायक है।

बादाम

badam

बादाम गुण में गर्म, वायु को दूर करने वाला, शरीर को पुष्टि व बल प्रदान करने वाला है। किंतु बादाम पित्त एवं कफ को बढ़ाने वाला, पचने में भारी होता है।

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बादाम के औषधीय उपयोग

 

शरीर की पुष्टि के लिए

रात को चार से पांच बादाम पानी में भिगोकर रख दें। सुबह इनका छिलका उतारकर बादाम को पीसकर दूध को उबालकर उसमें मिश्री एवं दो चम्मच घी और बादाम को मिलाकर दूध को ठंडा करके पीने से शरीर हष्ट-पुष्ट होता है और दिमाग का विकास होता है।

 

बादाम का तेल

बादाम के तेल की शरीर पर मालिश करने से त्वचा का सौंदर्य खिल उठता है व शरीर की पुष्टि भी होती है। बादाम का तेल नाक में दो-तीन बूंद डालने से मानसिक दुर्बलता दूर होकर सिर दर्द  भी मिट जाता है।

सूखे मेवे

sukhe meve

सूखे मेवे में बादाम, अखरोट, काजू , किशमिश, अंजीर, पिस्ता, छुआरे, चारोली, नारियल आदि का समावेश है।

sukhe meve

सूखे मेवे अर्थात ताजे फलों के उत्तम भागों को सुखाकर बनाया गया पदार्थ सूखे मेवे कहलाते हैं। ताजे फलों का बारह महीने मिलना मुश्किल है। सूखे मेवों से दूसरी ऋतु में भी फलों के उत्तम गुणों का लाभ लिया जा सकता है। सूखे मेवे की खराब होने की संभावना ताजे फलों की अपेक्षा कम होती है। कम मात्रा में लेने पर भी ये फलों की अपेक्षा अधिक लाभकारी होते हैं।

 

सूखा मेवा पचने में भारी होता है इसीलिए इसका उपयोग शीत या जाड़े की ऋतु में किया जा सकता है क्योंकि सर्दियों के दिनों में अन्य ऋतुओं की अपेक्षा व्यक्ति की जठराग्नि प्रबल होती है।

 

सूखा मेवा उष्ण, स्निग्ध, मधुर, बलप्रद, वातनाशक एवं पौष्टिक होता है।

 

सूखे मेवे कोलेस्ट्रॉल बढ़ाते हैं। अतः बीमारी के समय सूखे मेवे नहीं खाने चाहिए। सूखे मेवे में कैलोरी बहुत अधिक होती है जो शरीर को पुष्ट करने के लिए उपयोगी है। शरीर को हष्ट-पुष्ट रखने के लिए सूखे मेवे का सेवन लाभदायक है। सूखे मेवे से क्षारतत्त्व की पूर्ति की जा सकती है। सूखे मेवे में विटामिन ताजे फलों की अपेक्षा कम होते हैं।

गुड

गुड गन्ने के रस को पकाकर बनाया जाता है। गुड रसायनों के मिश्रण से रहित होने के कारण स्वास्थ्य के लिए अच्छा होता है। अक्टूबर के महीने से लेकर फरवरी मार्च तक ताजा गुड भरपूर मात्रा में मिलता है। गन्ने के रस से चीनी बनाने में कैल्शियम, लौह तत्व, गंधक, पोटेशियम फॉस्फोरस आदि महत्वपूर्ण तत्व नष्ट हो जाते हैं जबकि गुड में ये तत्व मौजूद रहते हैं। शरीर में खून की कमी होने पर या शरीर से खून बह जाने पर खून में हीमोग्लोबिन कम हो जाता है। ऐसी स्थिति में गुड़ का नियमित सेवन करने से इस कमी की पूर्ति की जा सकती है क्योंकि गुड में 114 प्रतिशत मिलीग्राम लौह तत्व पाया जाता हैं।

 

महिलाओं में आमतौर पर लौह तत्व की कमी पायी जाती है। भुने हुए चने के साथ गुड़ का सेवन करने से इस कमी को पूरा किया जा सकता है। गुड चिक्की के रूप में भी काफी प्रचलित है। गुड़ की प्रकृति गर्म होने के कारण सर्दियों के दिनों में अधिक मात्रा में सेवन किया जाता है। गुड पाचक भी है खाना खाने के बाद 50 ग्राम गुड़ का सेवन कर सकते हैं।

 

गुड में कैल्शियम होने के कारण बच्चों की हड्डियों की कमजोरी में यह बहुत लाभकारी है। बढ़ते बच्चों के लिए यह अमृत तुल्य है। गुड में विटामिन बी पर्याप्त मात्रा में होता है। गुड में पोर्ट पेन्टोथिनिक एसिड, इनासिटोल सबसे अधिक है जो कि स्वास्थ्य के लिए हितकारी है।

तिल का तेल

तिल का तेल अपनी स्निग्धता, कोमलता और पतलेपन के कारण शरीर के समस्त स्रोतों में प्रवेश कर धीरे-धीरे चर्बी का नाश करता है। तिल का तेल विशेष रूप से वातघ्न है। तिल का तेल वायु के रोगों को मिटाता है। तिल का तेल अन्य तेलों की अपेक्षा श्रेष्ठ है। महर्षि चरक तिल के तेल को बलवर्धक, त्वचा के लिए हितकर, गर्म एवं स्थिरता देने वाला मानते हैं।

 

तिल के तेल का औषधिय उपयोग

 

दाँत हिलना व पायरिया

दाँत हिलने पर तिल का तेल 10 मिनट मुहँ में रखने से हिलते हुए दाँत भी मजबूत हो जाते हैं और पायरिया भी मिटता है।

 

मोटापा व खाज खुजली

तिल के गुनगुने तेल से एक महीने तक मालिश करने से त्वचा में निखार आ जाता है। चर्बी कम हो जाती है और खाज खुजली पर तिल का तेल लगाने से खाज खुजली मिट जाती है।

 

एड़ियाँ फटने पर

तिल के तेल में मोम और सेंधा नमक मिलाकर एड़ी पर लगाने से एड़ियाँ मुलायम हो जाती हैं।

 

जलने पर

जले हुए भाग पर तिल का तेल गर्म करके लगाने से लाभ होता है।

 

घाव पर

तिल के तेल में पट्टी भिगोकर बाँधने से घाव ठीक हो जाता है।

मेथी

methi

आहार में हरी सब्जियों का विशेष महत्व है। आधुनिक विज्ञान के मत अनुसार हरे पत्तेवाली सब्जियों में क्लोरोफिल नामक तत्व रहता है। यह तत्व जंतुओं का प्रबल नाशक है। दाँत एवं मसूढ़ों में सड़न पैदा करने वाले जंतुओं को यह नष्ट करता है।

हरी सब्जियों में लौह तत्व काफी मात्रा में पाया जाता है। जो कि खून की कमी व शारीरिक कमजोरी को नष्ट करता है। हरी सब्जियों में पाया जाने वाला क्षार, खून की अम्लता को घटाकर उसका नियमन करता है।

methi

हरी सब्जियों में मेथी की सब्जी का प्रयोग भारत के प्रायः सभी भागों में अधिक होता है। मेथी को सुखाकर भी उपयोग में लाया जाता है। इसके अलावा मेथीदानों का प्रयोग छौंक में तथा कई औषधियों के रूप में किया जाता है। सर्दियों के दिनों में मेथी का पाक बनाकर भी इसका सेवन किया जाता है।

मेथी प्रायः हर समय उगाई जा सकती है। फिर भी अक्टूबर से फरवरी तक यह अधिक मात्रा में उगाई जाती है। मेथी की सब्जी तीखी, कड़वी, गरम, पितवर्धक, भूखवर्धक भूख को बढ़ाने वाली, पचने में हल्की, पेट साफ करने वाली, ह्रदय के लिए हितकर व बलप्रद होती है।

मेथी की सब्जी कफ के रोगियों के लिए अत्यंत हितकर होती है। मेथी पौष्टिक होती है। यह खून को साफ करती है। मेथी अरुचि, उल्टी, खाँसी सभी प्रकार की वायु जोड़ों का दर्द, कमर दर्द, पूरे शरीर का दर, डायबिटीज एवं निम्न रक्तचाप को मिटाने वाली है। मेथी आमदोष को मिटाती है एवं शरीर को स्वस्थ बनाती है।

 

मेथी का औषधीय उपयोग

 

कब्ज

मेथी की रेशेवाली सब्जी खाने से कब्ज में लाभ होता है।

 

डायबिटीज

मेथी की सब्जी का 100 मिलीलीटर रस सुबह को प्रतिदिन सेवन करने से लाभ मिलता है अथवा मेथी के दो चम्मच बीज रात में भिगोकर सुबह इन बीजों को चबाकर खाएं व इसका पानी भी पीने से लाभ होता है। भोजन में घी, तेल युक्त वस्तुएं व मीठी चीजों का सेवन न करने से लाभ होता है।

 

लो बीपी

जिन व्यक्तियों को निम्न रक्तचाप की शिकायत हो उनके लिए मेथी की सब्जी में अदरक लहसुन, गरम मसाला आदि डालकर बनाई गई सब्जी का सेवन लाभदायक होता है।

 

वायु का दर्द

प्रतिदिन हरी अथवा सूखी मेथी का सेवन करने से शरीर के 80 प्रकार के वायु के रोगों में लाभ होता है।

 

हाथ पैर का दर्द

वायु के कारण होने वाले हाथ पैर के दर्द में मेथी दानों को घी में सेककर उनका चूर्ण बनाएं इस चूर्ण में हल्का मीठा (बूरा) डालकर इसके लड्डू बनाए प्रतिदिन मेथी के एक लड्डू का सेवन करने से लाभ होता है।

 

सर्दी, जुकाम कफ दोष

जिनको हमेशा सर्दी, जुकाम, खांसी की शिकायत बनी रहती हो उन्हें मेथी की सब्जी में गरम मसाला, अदरक, लहसुन डालकर बनाएं और इसका प्रतिदिन सेवन करने से लाभ होता है।

 

आँव आने पर

5 ग्राम मेथी के पाउडर या चूर्ण में 100 ग्राम दही मिलाकर सेवन करने से लाभ होता है। दही अधिक खट्टा नहीं होना चाहिए।

 

लू लगने पर

हरी मेथी को जब हम काटकर रख लेते हैं तो उसे मेथी की सूखी भाजी कहते हैं। लू लगने पर मेथी की सूखी भाजी को ठंडे पानी में भिगोए अच्छी तरह भीग जाने पर इसे मसलकर छान लें और इस पानी में दो चम्मच शहद मिलाकर एक बार लू लगने वाले व्यक्ति को पिलाएं काफी लाभ मिलेगा।

लौंग

लौंग का उपयोग मसालों एवं सुगंधित पदार्थों में अधिक होता है। लौंग का तेल भी निकाला जाता है। लौंग में मुख, आमाशय एवं आँतों में रहने वाले सूक्ष्म कीटाणुओं का नाश करने एवं सड़न को रोकने का गुण है।
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लौंग का गुणधर्म

लौंग लघु, कड़वा, रुचिकर, तीक्ष्ण, विपाक में मधुर, पाचक, अग्नि जगाने वाली, ह्रदय को रुचने वाली है। लौंग पित्त, कफ, आँव, दर्द, अफारा, खाँसी, हिचकी, पेट की गैस, विष, प्यास तथा रक्त दोष का नाश करती है।

 

लौंग का औषधिय उपयोग

सर्दी लगने पर

पाँच लौंग पाँच काली मिर्च सात पत्ते तुलसी के एवं अदरक का टुकड़ा लेकर लौंग, काली मिर्च व अदरक तीनों को थोड़ा कूटकर इन सभी को एक गिलास पानी में पकाएं जब पानी आधा रह जाए तो इस काढ़े को सर्दी लगने पर मरीज को पिलाने से लाभ होता है।

 

कफ और खाँसी

कफ और खाँसी में तवा गर्म करके उसके ऊपर सात लौंग डालकर लौंग को सेक लें सेकने के बाद लौंग को पीसकर उसमें एक बड़ा चम्मच शहद मिलाकर सेवन करने से लाभ होता है।

 

दाँत का दर्द

लौंग के अर्क या पाउडर को रुई पर डालकर उस फोहे को दांत पर रखें इससे दांत के दर्द में लाभ होता है।

 

सिर दर्द

लौंग का तेल सिर पर लगाने से सिर दर्द में लाभ होता है।

 

श्वास की दुर्गंध

लौंग का चूर्ण खाने से अथवा दाँतो पर लगाने से दाँत मजबूत होते हैं। मुहँ की दुर्गंध, कफ, लार, थूक द्वारा बाहर निकल जाती है। ऐसा करने से मुख से श्वास सुगंधित निकलती है।

 

प्यास या जी मिचलाना

जी मिचलाने पर सात लौंग पानी में उबालकर पानी ठंडा करके रोगी को पिलाने से लाभ होता है।

हरड़ हरीतकी

भारत में विशेषकर हिमालय में कश्मीर से आसाम तक हरड़ के वृक्ष पाए जाते हैं। आयुर्वेद ने हरड़ को अमृता, प्राणदा, कायस्था, विजया, मेध्या आदि नामों से गौरवान्वित किया है। हरड एक श्रेष्ठ रसायन है।

हरड़ में लवण को छोड़कर मधुर, अम्ल, कटु, तिक्त, कषाय ये पाँचों रस पाए जाते हैं। यह लघु, रूक्ष, विपाक में मधुर तथा उष्ण होती है। इन गुणों से यह वात, पित्त, कफ तीनों दोषों का नाश करती है।

हरड़

 

हरड़ व्रण शोधक, जठराग्नि तीव्र करने वाली, पाचक, मल अनुलोमक, मेध्य, आँखों की रोशनी बढ़ाने में सहायक है। हरड़ विशिष्ठ द्रव्यों के साथ मिलकर यह विविध रोगों में लाभदायी होती है। पाचन तंत्र पर इसका कार्य विशेष रूप से दिखाई देता है।

हरड़ के सेवन की विधि

हरड़ या हरीतकी को चबाकर खाने से भूख बढ़ती है। पीसकर पानी के साथ फंकी लेने से मल साफ आता है। और सेककर खाने से वात-पित्त-कफ तीनों दोषों को कम करती है। खाना खाते समय हरड़ का सेवन करने से शरीर की शक्ति व पुष्टि में वृद्धि करती।
पाचन शक्ति ठीक करने के लिए भोजन करने के बाद तीन से चार ग्राम की मात्रा में इसका सेवन करें।

बुद्धि वर्धक व इंद्रिय बलवर्धक

हरड़ बुद्धि वर्धक है। हरीतकी आंखों तथा इंद्रियों का बल बढ़ाती है। हरड़ विकृत कफ तथा मल का नाश करके बुद्धि तथा इंद्रियों का जड़त्व नष्ट करके उन्हें कुशाग्र बनाती है।
शरीर में मल संचय होने पर बुद्धि तथा इंद्रियां बलहीन हो जाती हैं। हरड़ इस संचित मल का शोधन करके धातु शुद्धि करती है। इससे बुद्धि इन्द्रियां निर्मल और समर्थ बन जाती हैं। इसीलिए हरड़ को मेध्या कहा गया है।

आँखों का तेज बढ़ाने में सहायक

हरड़ आँखों का बल बढ़ाती है। नेत्र ज्योति बढ़ाने में त्रिफला श्रेष्ठ द्रव्य है। दो ग्राम त्रिफला चूर्ण को एक चम्मच घी के साथ मिलाकर सेवन करने से आंखों का बल तथा आंखों की रोशनी बढ़ती है।

हरड़ का रासायनिक कार्य

हरड़ स्वयं धातुओं का पोषण नहीं करती है। यह धात्वग्नि को बढ़ाती है। धातु अग्नि बढ़ने से नए उत्पन्न होने वाले रस रक्तादि धातु शुद्ध होकर प्राकृतिक बनने लगते हैं। धातुओं में स्थित विकृत कफ तथा मल का पाचन शोधन करके धातुओं को निर्मल बनाती है। हरड सभी धातुओं व इन्द्रियों की शुद्धि करके यौवन की रक्षा करती है। इसीलिए इसे कायस्था कहा गया है।

त्रिदोषों के अनुरूप हरड का सेवन

कफ रोगों में तीन ग्राम हरड़ चूर्ण सेंधा नमक के साथ सेवन करना चाहिए। अधिक पित्त बनने पर चार ग्राम हरड़ के साथ मिश्री मिलाकर सेवन करना चाहिए।
वात रोगों में एक साबुत हरड़ को घी में भूनकर सेवन करें। अथवा चार ग्राम हरड़ के चूर्ण को घी में मिलाकर सेवन करें।

सावधानी

अधिक मेहनत करने वाले, कमजोर, गर्म प्रकृति वाले, गर्मी की ऋतु, रक्त विकार व पित्त दोष में हरण का सेवन नहीं करना चाहिए।
आयुर्वेद के श्रेष्ठ आचार्य वाठभठ के अनुसार हरड़ घी में भूनकर नियमित सेवन करने से शरीर बलवान होकर दीर्घायु को प्राप्त होता है।

हरड़ का औषधीय उपयोग

मंदाग्नि

तिक्त रस व उष्ण वीर्य होने के कारण हरड़ यकृत को उत्तेजित करती है। पाचक स्राव बढ़ाती है। आमाशय में स्तिथ विकृत कफ का नाश करती है। दस्त, पेट दर्द, अफारा आदि रोगों में विशेषत छोटी हरड़ चबाकर खाने से लाभ होता है।
यह जठराग्नि के साथ-साथ रस रक्तादि सप्त धातुओं की धात्वनिओं की वृद्धि करती है। जिससे शरीर में आम का पाचन होकर रस रक्तादि सप्तधातु प्राकृतिक रूप से बनने लगते हैं।

मलावरोध

तीन से पांच ग्राम हरड़ का चूर्ण पानी के साथ लेने से मल का पाचन होकर वह शिथिल व द्रवरूप में बाहर निकलता है। जिससे कब्ज का नाश होता है।

दस्त में हरड़ का उपयोग

हरड़ पानी में उबालकर सेवन करने से मल में से द्रव्यभाग का शोषण करके बंधे हुए मल को बाहर निकालती है जिससे दस्त में राहत मिलती है।

अम्लपित्त

दो ग्राम हरड़ चूर्ण, मुनक्का व मिश्री के साथ सेवन करने से अम्लपित्त से उत्पन्न रोगों में लाभ होता है।

दालचीनी

भारत में दालचीनी के वृक्ष हिमालय तथा पश्चिमी तट पर पाए जाते हैं। इन वृक्षों की छाल दालचीनी के नाम से प्रसिद्ध है। यह रस में तीखी, कड़वी तथा मधुर होती है। उष्ण तीक्ष्ण होने के कारण पाचन करती है और विशेष रूप से कफ का नाश करने वाली है। यह अपने मधुर रस से पित्त का शमन करती है और उष्ण वीर्य होने से वात का शमन करती है अतः यह त्रिदोषनाशक है।
dalchini

 

सावधानी 

दालचीनी खून में पित्त की मात्रा बढ़ाने वाली होती है। दालचीनी के अधिक सेवन से शरीर में गर्मी उत्पन्न होती है। अतः गर्मी के दिनों में इसका लगातार सेवन न करें।

दालचीनी का औषधीय उपयोग 

मुहँ के रोग 

दालचीनी के टुकड़े को चूसने से मुख की दुर्गंध का नाश होता है और मसूढ़े मजबूत होते हैं।

दाँतो का दर्द व दाँतों के कीड़े 

दालचीनी के तेल में भिगोया हुआ रुई का फोहा दाँत की जड़ में रखने से दाँत के दर्द व दाँत के कीड़ों का नाश होता।

पेट के रोग 

दालचीनी, इलायची और तेजपात को समान मात्रा में लेकर मिश्रण बनाएं। इस मिश्रण का एक ग्राम चूर्ण एक चम्मच शहद के साथ सेवन करने से पेट के अनेक विकार जैसे मंदाग्नि, अजीर्ण, पेट का दर्द आदि रोगों में लाभ मिलता है।

सर्दी खाँसी जुकाम 

दालचीनी का एक ग्राम चूर्ण एवं एक ग्राम सितोपलादि चूर्ण एक चम्मच शहद के साथ सेवन करने से सर्दी, खाँसी, जुकाम में तुरंत राहत मिलती है।

दालचीनी कोलेस्ट्रोल की अधिक मात्रा को घटाती है 

दालचीनी खून को शुद्ध करती है। दालचीनी के एक ग्राम चूर्ण को एक गिलास दूध में मिलाकर पीने से खून में उपस्थित कोलेस्ट्रोल की अतिरिक्त मात्रा घटने लगती है।

जोड़ों का दर्द 

दालचीनी का एक ग्राम चूर्ण और दो चम्मच शहद को एक कप गुनगुने पानी में मिलाकर सुबह-शाम प्रतिदिन पीने से जोड़ों के दर्द में लाभ होता है।

वृद्धावस्था 

बुढ़ापे में रक्तवाहिनियां कड़क और रुक्ष होने लगती हैं। तथा उनका लचीलापन कम होने लगता है। एक चने के बराबर दालचीनी का चूर्ण लेकर एक चम्मच शहद में मिलाकर नियमित सेवन करने से बुढ़ापे में होने वाले इन लक्षणों से राहत मिलती है। शरीर में स्फूर्ति बढ़ती है, त्वचा पर झुर्रियां नहीं पड़ती और मेहनत करने पर जल्दी थकान नहीं होती।

परवल

परवल को सभी सब्जियों में सबसे अच्छा माना गया है। आयुर्वेद में एकमात्र परवल को ही वर्ष भर वर्षभर पथ्य के रूप में स्वीकार किया गया है। क्योंकि परवल गुण में हल्के, पाचक, गरम, स्वादिष्ट, हृदय के लिए हितकर, जठराग्नि वर्धक, स्निगधतावर्धक, पौष्टिक, विकृत कफ को बाहर निकालने वाला और त्रिदोष नाशक है। परवल सर्दी, खांसी, बुखार, पेट के कीड़े, रक्त दोष व खून की कमी को दूर करता है।
परवल दो प्रकार के होते हैं। मीठे और कड़वे। परवल सब्जी के लिए सदैव मीठे, कोमल बीज वाले और सफेद गूदे वाले परवल का उपयोग किया जाता है। जो परवल ऊपर से पीले तथा कड़क बीज वाले हो जाते हैं उनकी सब्जी अच्छी मानी जाती है।

 

परवल

 

परवल का औषधीय उपयोग

ह्रदय रोग व शरीर की पुष्टि

परवल की सब्जी को घी अथवा सरसों के तेल में बनाकर प्रतिदिन सेवन करने से हृदय रोग में लाभ होता है तथा शरीर का वजन भी बढ़ता है।

कफ का बढ़ना

डंठल के साथ मीठे परवल के 6 ग्राम पत्ते व 3 ग्राम सोंठ को लेकर एक बड़े गिलास को पानी से भरकर परवल के पत्ते व सोंठ डालकर भिगोने में पानी सहित उबालें इसे इतना उबाले की पानी आधे में से आधा रह जाए इस काढ़े में दो चम्मच शहद मिलाकर सुबह-शाम सेवन करने से कफ सरलता से निकल जाता है।

आम दोष

जिन व्यक्तियों को पेट में आम दोष की परेशानी होती है वे व्यक्ति परवल के टुकड़ों को पानी में उबालें उबालते समय पानी में सोंठ का टुकड़ा पीपरामूल, लेडी पीपर, काली मिर्च, जीरा में नमक डालें पानी का चौथाई भाग शेष रहने पर सुबह-शाम इसका सेवन करने से आम दोष में लाभ होता है।

रक्त विकार

खून में खराबी होने प्रतिदिन परवल की सब्जी में धनिया, जीरा, काली मिर्च और हल्दी डालकर घी में तड़का लगाकर सब्जी का सेवन करना चाहिए।

सावधानी

गर्म तासीर वालों के लिए परवल का अधिक सेवन हानिकारक है।

धनिया

धनिया सर्वत्र प्रसिद्ध है। भोजन बनाने में इसका प्रतिदिन उपयोग होता है। हरा धनिया जब पूरा विकसित हो जाता है तो उस पर हरे रंग के बीज की फलियां लगती हैं जब वे फलियां सूख जाती हैं तो उनसे निकला हुआ बीज सूखा धनिया या साबुत धनिया कहलाता है।
सभी प्रकार की सब्जियों व दाल जैसे खाद्य पदार्थों में काटकर डाला हुआ हरा धनिया उन्हें सुगंधित व गुणवान बनाता है। हरा धनिया गुण में ठंडा रुचिकारक व पाचक है। हरे धनिए के उपयोग से खाद्य पदार्थ अधिक स्वादिष्ट व रोचक बनते हैं। हरा धनिया केवल सब्जी में ही उपयोगी नहीं है अपितु यह उत्तम प्रकार की औषधि भी है।
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गुणधर्म 

हरा धनिया स्वाद में कटु, कषाय, स्निग्ध, पचने मे हल्का, मूत्रल, दस्त बंद करने वाला, जटरागनीवृद्धक बढ़े हुए पित्त का नाश करने वाला एवं गर्मी से उत्पन्न तमाम रोगों मैं लाभदायक है।

धनिये का औषधीय उपयोग 

अरुचि व मंदाग्नि 

हरे धनिए व पुदीने की पत्तियां तोड़कर उन्हें धोकर उसमें जीरा, काली मिर्च, सेंधा नमक, अदरक व एक हरी मिर्च पीसकर इसमें जरा सा गुड व नींबू का रस मिलाकर चटनी तैयार करें भोजन के समय इस चटनी को खाने से अरुचि व मंदाग्नि मिटती है।

तृषा रोग जीब सूखने पर 

हरे धनिये के 50 मिलीलीटर रस में मिश्री मिलाकर पीने से शरीर की गर्मी शांत होती है।

रक्तपित्त 

खून में पित्त की मात्रा बढ़ने पर हरे धनिए के 50 ग्राम रस में 50 ग्राम अंगूर का रस मिलाकर पीने से आराम मिलता है।

बच्चों का पेट दर्द व अजीर्ण 

सूखे धनिये का दो चम्मच पाउडर वह 3 ग्राम सोंठ लेकर एक गिलास पानी को भिगोने में डालकर इसमें सोंठ व धनिया पाउडर डालकर इतना पकाएं की पानी आधा रह जाए इस काढ़े को पिलाने से बच्चों का पेट दर्द व अजीर्ण ठीक होता है।

अदरक

अदरक का गुण धर्म

अदरक रुखा, तीखा, उक्ष्ण तीक्ष्ण होने के कारण कफ तथा वात का नाश करता है, पित्त को बढ़ाता है। इसका अधिक सेवन रक्त को पुष्ट करता है। यह उत्तम आम पाचक है आम से उत्पन्न होने वाले अजीर्ण, अफारा, पेट दर्द, उल्टी आदि रोगों में तथा कफ जनित रोगों में जैसे सर्दी खांसी में अदरक बहुत उपयोगी है।
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सावधानियां

खून में पित्त की मात्रा बढ़ने पर हाई ब्लड प्रेशर, अल्सर, कोढ़ में खून बहने पर अदरक का सेवन नहीं करना चाहिए अदरक साक्षात् अग्नि रूप है इसलिए अदरक को कभी भी फ्रिज में नहीं रखना चाहिए फ्रिज में रखने से इसका अग्नि तत्व नष्ट हो जाता है।

अदरक का औषधीय उपयोग

उल्टी

उल्टी लगने पर एक चम्मच अदरक के रस में मिश्री मिलाकर पीने से उल्टी आना व जी मिचलाना बंद हो जाता है। इस रस को 3 घंटे के अंतराल में एक-एक चम्मच ले सकते हैं।

मंदाग्नि

एक चम्मच अदरक का रस एक चम्मच नींबू का रस दोनों को बराबर मात्रा में लेकर उसमें सेंधा नमक मिलाकर सेवन करने से जठराग्नि तीव्र होती है।

पेट का दर्द

पांच ग्राम अदरक का रस पांच ग्राम पुदीने के रस में चुटकी भर सेंधा नमक मिलाकर पीने से पेट का दर्द ठीक होता है।

पेट की गैस

आधा चम्मच अदरक के रस में हींग व काला नमक मिलाकर सेवन करने से पेट की गैस ठीक होती है।

सर्दी खांसी

सर्दी खांसी में 20 ग्राम अदरक के रस में दो चम्मच शहद मिलाकर सुबह-शाम सेवन करने से गैस की तकलीफ दूर होती है।

खांसी एवं श्वास रोग में

15 ग्राम अदरक का रस व 15 ग्राम तुलसी का रस निकालकर उसमें दो चम्मच शहद मिलाकर सेवन करने से खांसी व श्वास रोगों में लाभ होता है।

गाजर

गाजर स्वाद में मधुर, कसैली, तीक्ष्ण, गरम, मूत्रल, दस्त ठीक करने वाली, खून साफ करने वाली, पेशाब खुलकर लाने में सहायक, कफ निकालने वाली, वातदोषनाशक, पुष्टिवर्धक तथा दिमाग एवं नस नाड़ियों के लिए बल प्रदान करने में सहायक है।
गाजर अफारा पेट के रोग, पथरी सूजन, खाँसी, पेशाब की जलन तथा दुर्बलता का नाश करने वाली है।
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गाजर को कच्चा खाने से अधिक लाभ होता है। गाजर के अंदर का पीला भाग निकालकर इसका सेवन करना चाहिए क्योंकि यह अत्यधिक गर्म होता है।
गाजर में आलू से छह गुना अधिक कैल्शियम होता है। कैल्शियम एवं कैरोटीन की प्रचुर मात्रा होने के कारण छोटे बच्चों के लिए यह उत्तम आहार है।
गाजर में आँतो के हानिकारक जंतुओं को नष्ट करने का अद्भुत गुण पाया जाता है।इसमें विटामिन ए काफी मात्रा में पाया जाता है। अतः इसका सेवन आंखों के रोगों में भी लाभदायक है।
गाजर खून को साफ करती है। इसके सेवन से त्वचा के रोगों में भी लाभ होता है। गाजर में लौह तत्व प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। गाजर को खूब चबाकर खाने से दाँत व मसूड़े मजबूत होते हैं और दाँत स्वच्छ एवं चमकदार भी बनते हैं।

सावधानी

अत्यधिक मात्रा में गाजर खाने से पेट में दर्द हो जाता है। गाजर के अंदर का पीला भाग खाने से यह छाती में जलन पैदा करता है।
अतः पित्त प्रकृति वाले लोगों को गाजर का कम एवं सावधानीपूर्वक सेवन करना चाहिए।

गाजर का औषधीय उपयोग

दिमागी कमजोरी

गाजर के रस का रोजाना सेवन करने से दिमागी कमजोरी दूर होती है।

हिचकी

गाजर के रस की चार पाँच बूंदे दोनों नथुनों में डालने से लाभ होता है।

आँखों के रोग

पढ़ते समय आँखों में परेशानी होना, कम दिखाई देना आदि रोगों में कच्ची गाजर चबाकर खाना या गाजर के रस का सेवन नियमित करने से लाभ होता है।

पाचन संबंधी गड़बड़ी

अरुचि, मंदाग्नि, अपच आदि पेट के रोगों में गाजर के एक एक गिलास रस में नमक, हरा धनिया, जीरा, काली मिर्च, नींबू का रस डालकर पीने से पाचन संबंधी गड़बड़ी ठीक होती है।

जलने पर

चलने से होने वाली दाह में जले हुए प्रभावित अंग पर बार-बार गाजर का रस लगाने से आराम मिलता है।

पेशाब की परेशानी

गाजर का रस पीने से पेशाब खुलकर आता है और खून में शर्करा की मात्रा कम होती है।

अमरूद

अमरूद आमतौर से पूरे भारत में पाया जाने वाला फल है। अमरुद सस्ता एवं गुणकारी फल है। संस्कृत में इसे अमृत फल भी कहा गया है।
आयुर्वेद के अनुसार पका हुआ अमरूद स्वाद में खट्टा, मीठा, कसैला, गुण में ठंडा, पचने में भारी, कब्ज तथा रुचिकारक पित्तदोषनाशक एवं हृदय के लिए हितकर है।

 

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अमरूद मूर्छा, कीड़े, प्यास, दाद व जलननाशक है। गर्मी के तमाम रोगों में अमरूद का सेवन हितकारी है। अमरूद बलवर्धक, सत्वगुण एवं बुद्धिवर्धक होता है।
अमरूद खाते समय इस बात का पूरा ध्यान रखना चाहिए कि इसके बीज ठीक से चबाये बिना पेट में न जाएं। अमरुद को अच्छी तरह चबाकर खाएं अन्यथा इसके बीज निकालकर केवल इसके गूदे का सेवन करें।
पके अमरूद का ही सेवन करें सुबह खाली पेट नाश्ते में अमरूद का सेवन लाभकारी होता है। दूध एवं फल खाने के बीच में दो से तीन घंटे का अंतर अवश्य रखें।

सावधानी

अधिक मात्रा में अमरूद का सेवन करने से वायु, दस्त एवं बुखार होने की संभावना रहती है। जिनकी पाचन शक्ति कमजोर हो उन्हें अमरुद कम खाने चाहिए। अमरूद के अधिक सेवन करने से मंदाग्नि भी हो जाती है।

सेब

सेब वात तथा पित्त का नाश करने वाला पुष्टिदायक, कफकारक, भारी रस तथा पाक में मधुर, ठंडा, रुचिकारक, हृदय के लिए हितकारी व पाचन शक्ति को बढ़ाने वाला है।

 

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यूनानी मत के अनुसार 

सेब हृदय मस्तिष्क यकृत तथा जठराग्नि को बल देता है, खून बढ़ाता है तथा इसका नियमित सेवन शारीरिक सौंदर्य की वृद्धि करता है।
सेब के गूदे की अपेक्षा उसके छिलके में विटामिन सी अधिक मात्रा में होता है। अन्य फलों की तुलना में सेब में फास्फोरस की मात्रा सबसे अधिक होती है। सेब में लौह तत्व भी अधिक होता है। अतः यह खून की कमी व मस्तिष्क संबंधी कमजोरी के लिए हितकारी है।
सेब में टाटीरिक एसिड होने के कारण यह आधे या एक घंटे में पच जाता है। और खाए हुए अन्य आहार को भी पचा देता है।
कुछ दिन तक केवल सेब के सेवन करने से शरीर के सभी विकार दूर होते हैं। पाचन क्रिया बलवान बनती है और शरीर में स्फूर्ति आती है। प्रातः काल खाली पेट सेब का सेवन स्वास्थ्य के लिए लाभदायक है। सेब के सेवन से मसूड़े मजबूत होते हैं। दिमाग शांत होता है। ब्लड प्रेशर कम होता है तथा नींद अच्छी आती है।

सेब का औषधीय उपयोग

खून के विकार व त्वचा रोग

रक्त विकार या खून में खराबी के कारण बार बार फोड़े फुंसियां होती हैं पुराने त्वचा रोग के कारण चमड़ी शुष्क हो गयी हो खुजली अधिक लगती हो ऐसी अवस्था में भोजन त्यागकर केवल सेब का सेवन करने से लाभ होता है।

पाचन के रोग

सेब को अंगारे पर सेंककर खाने से अत्यंत बिगड़ी पाचनक्रिया ठीक होती है।

दाँत के रोग

दाँतों से खून आने पर सेब का रस सोडे के साथ मिलाकर दाँतों पर मलने से दाँतों से निकलने वाला खून बंद हो जाता है एवं दाँत स्वच्छ होते हैं।

सामान्य बुखार

बार-बार सामान्य बुखार आने पर भोजन का त्याग करके केवल सेब का सेवन करने से ऐसे बुखार से मुक्ति मिलती है और शरीर बलवान बनता है।

सावधानी

सेब का गुण धर्म शीतल है। इसके सेवन से कुछ लोगों को सर्दी जुकाम भी हो जाता है। किसी व्यक्ति को इसके सेवन से कब्ज भी हो जाता है। अतः अपनी प्रकृति को पहचान कर ही सेब का सेवन करें।

सीताफल

सीताफल अगस्त से नवम्बर के महीने में मिलने वाला फल है। यह एक स्वादिष्ट फल है।
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आयुर्वेद के अनुसार

सीताफल शीतल, पित्तशामक, कफ वर्धक, गर्मी नाशक, पोस्टिक मांस एवं खून बढ़ाने वाला, उल्टी बंद करने वाला, बलवर्धक, वातदोषनाशक एवं हृदय के लिए हितकर है।

वैज्ञानिक दृष्टि से

सीताफल में कैल्शियम, लौह तत्व, फास्फोरस, विटामिन, थायमीन, राइबोफ्लेविन एवं विटामिन सी आदि भरपूर मात्रा में होते हैं।
जिन व्यक्तियों की प्रकृति गर्म है अर्थात पित्तप्रधान है। उनके लिए सीताफल अमृत के समान गुणकारी है।

सीताफल का औषधीय उपयोग

हृदय पुष्टि

जिन व्यक्तियों का हृदय कमजोर हो, हृदय की धड़कन अधिक हो, घबराहट होती हो, हाई ब्लड प्रेशर हो ऐसे रोगियों के लिए भी सीताफल का सेवन लाभदायक है। ऐसे रोगी सीताफल की ऋतु में उसका नियमित सेवन करें तो उनका हृदय मजबूत एवं क्रियाशील बनता है।

भूख शांत न होना

जिन व्यक्तियों को अधिक भूख लगती हो भोजन करने के पश्चात भी भूख शांत न होती हो तो ऐसे रोग में सीताफल का सेवन करने से भस्मक रोग ठीक होते हैं।

सावधानी

सीताफल गुण में अत्यधिक ठंडा होने के कारण अधिक मात्रा में सेवन करने से सर्दी होती है। कई व्यक्तियों को ठंड लगकर बुखार आने लगता है। अतः जिनकी प्रकृति कफ प्रधान हो वे सीताफल का सेवन न करें जिनकी पाचन शक्ति मंद हो बैठे रहने का काम करते हों उन्हें सीताफल का सेवन सावधानी पूर्वक करना चाहिए।

आँवला

आँवला एक उत्तम औषधि है। जब ताजे आँवले मिलते हो तब इनका सेवन सबके लिए लाभदायक है। ताजे आँवले का सेवन हमें कई रोगों से बचाता है। कच्चे आँवले को सुखाकर उसका चूर्ण बनाया जाता है और कच्चे आंवले को चीनी की चाशनी में पकाकर उसका मुरब्बा बनाया जाता है। चवनप्राश भी बनाया जाता है जो कि वर्षभर उपयोग किया जा सकता है।

 

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आयुर्वेद के अनुसार आँवले थोड़े खट्टे, कसैले, मीठे, ठंडे हल्के, त्रिदोष वात, पित्त, कफ का नाश करने वाले खून साफ करने वाले रुचिकर, मूत्रल, पौष्टिक, बालों की वृद्धि में सहायक टूटी हड्डी जोड़ने में सहायक शारीरिक सौंदर्य को बढ़ाने वाले, आंखों की ज्योति बढ़ाने वाले, गर्मी का नाश करने वाले एवं दाँतों को मजबूती प्रदान करने वाले होते है।
आँवला एक श्रेष्ठ रसायन है। आँवला शरीर में रस रक्तादि सप्तधातुओं को पुष्ट करता है। आँवले के सेवन से आयु, स्मृति, शारीरिक तेज व बल बढ़ता है। ह्रदय एवं मस्तिष्क को शक्ति मिलती है। आंखों की रोशनी बढ़ती है और बालों की जड़ें मजबूत होती हैं।
आँवला श्वास, खांसी, अजीर्ण, दस्त, शरीर की गर्मी, बवासीर, पीलिया एवं टी बी जैसे रोगों में लाभदायक होता है।

आँवले का औषधीय उपयोग

कब्ज

गर्मी के कारण हुई कब्ज में आँवले का 3 से 5 ग्राम चूर्ण घी एवं मिश्री के साथ चाटने से कब्ज ठीक होता है।

दूसरा उपयोग

त्रिफला चूर्ण जो कि हरड़, बहेड़ा, आँवला तीनों की समान मात्रा लेकर बनाया जाता है रात को खाना खाने के बाद इस चूर्ण को आधा से एक चम्मच पानी के साथ सेवन करने से कब्ज ठीक होता है।

सिर दर्द

आँवले के तीन से पांच ग्राम चूर्ण को घी एवं मिश्री मिलाकर सेवन करने से पित्त तथा वायु दोष से उत्पन्न सिर दर्द में राहत मिलती है।

अत्यधिक पसीना आना

हाथ पैरों में अधिक पसीना आता हो तो प्रतिदिन आंवले के बीस से तीस मिलीलीटर रस में मिश्री डालकर पियें अथवा रात्रि में त्रिफला चूर्ण का सेवन करें भोजन में गर्म खाद्य पदार्थों का सेवन न करें।

दांतो की मजबूती

आँवले के चूर्ण को पानी में उबालकर उस पानी से कुल्ला करने से दांत मजबूत एवं स्वच्छ होते हैं।

जामुन

जामुन पचने मे हल्का, स्वाद में खट्टा, मीठा व जठराग्नि को तीव्र करने में सहायक है। जामुन वर्षा ऋतु में होने वाले पेट के रोगों में उपयोगी है। जामुन में लौह तत्व पर्याप्त मात्रा में होता है। अतः पीलिया के रोगियों के लिए जामुन का सेवन हितकारी है।
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जामुन का सेवन यकृत के रोगों को दूर करता है व खून में उत्पन्न अशुद्धियों को दूर कर रक्त को साफ करता है। मधुमेह के रोगियों के लिए जामुन का सेवन अत्यंत लाभदायक है।

सावधानी

जामुन हमेशा भोजन के बाद ही खाना चाहिए। भूखे पेट जामुन बिल्कुल न खाएं, जामुन खाने के तुरंत बाद दूध न पिए, जामुन पर नमक लगाकर ही खाएं। अधिक जामुन का सेवन करने पर छाछ में नमक डालकर पीएं।
जामुन वात दोषों को बढ़ाने में सहायक है। अतः वायु प्रकृति वाले व्यक्तियों को जिनको शरीर पर सूजन है, उल्टी है व लंबे समय से उपवास या व्रत करने वाले व्यक्तियों को इनका सेवन नहीं करना चाहिए।

जामुन का औषधीय उपयोग

मधुमेह या डायबिटीज

डायबिटीज के रोगियों को जामुन का सेवन रोजाना करना चाहिए। खूब पके हुए जामुन को सुखाकर बारीक कूटकर बनाए चूर्ण को प्रतिदिन एक चम्मच सुबह पानी के साथ, एक चम्मच शाम को पानी के साथ सेवन करने से डायबिटीज के रोगियों को काफी लाभ मिलता है।

मुँहासे

जामुन के बीज को पानी में घिसकर मुंह पर लगाने से मुंहासे ठीक होते हैं।

आवाज बैठना

जामुन की गुठलियों को पीसकर शहद में मिलाकर गोलियां बनाएं दो-दो गोली रोजाना चार पांच बार चूसने से बैठा हुआ गला खुल जाता है। आवाज का भारीपन ठीक हो जाता है।

दस्त

जामुन के पेड़ की पत्तियों को लेकर जो पत्तियां न ज्यादा पकी हुई न ज्यादा मुलायम उनको तोड़कर पीस लें इनमे जरा सा सेंधा नमक मिलाकर इसकी गोलियां बना लें एक एक गोली सुबह-शाम पानी के साथ सेवन करने से किसी भी तरह के दस्त ठीक हो जाते हैं।

त्रिफला

त्रिफला किसे कहते हैं?

आंवला, हरड़, बहेड़ा तीन वस्तुओं का मिश्रण त्रिफला कहलाता है।

 

त्रिफला का चूर्ण कैसे बनता है?

त्रिफला का चूर्ण बनाने के लिए आंवला, हरड़, बहेड़ा तीनों को समान मात्रा में मिलाकर चूर्ण तैयार किया जाता है। यह चूर्ण 1 से 7 ग्राम तक सेवन किया जा सकता है।

 

त्रिफला चूर्ण के औषधीय प्रयोग

आंखों के रोग 

आंखों के सभी रोगों के लिए त्रिफला एक उत्तम अक्सीर है। इस चूर्ण को घी तथा मिश्री के साथ मिलाकर खाने से कुछ महीने में आंखों के रोग दूर होते है। जैसे नेत्रों में सूजन, जलन, दर्द, लालिमा आदि अगर आंखों में खुजली लगती हो तो त्रिफला के जल से आंखों को धोएं। त्रिफला चूर्ण का नियमित सेवन करने से नेत्र संबंधी समस्त बीमारियां ठीक होती हैं। व आंखों की ज्योति एवं तेज भी बढ़ता है।

 

त्रिफला जल बनाने की विधि 

कांच के बर्तन में 2 ग्राम त्रिफला चूर्ण 200 ग्राम जल में भिगोकर रखें 5 या 6 घंटे बाद उस जल को ऊपर से निथार कर बारीक स्वच्छ कपड़े से छान लें फिर उस जल से आंखों को धोएं अथवा उस जल में पलकें झपकाए।

 

मोटापा 

त्रिफला चूर्ण पानी में उबालकर शहद मिलाकर पीने से मोटापा कम होता है।

 

चर्म रोग 

दाद, खाज, फोड़े, फुंसी आदि चर्म रोगों में सुबह-शाम 6 से 8 ग्राम त्रिफला चूर्ण लेना हितकारी माना गया है।

 

मुख पाक (मुँह आना) 

जिन व्यक्तियों को मुंह आने की बीमारी हो अर्थात मुख पाक हो जाता हो वे रोजाना रात में 6 ग्राम त्रिफला चूर्ण पानी के साथ सेवन करें और त्रिफला जल से कुल्ला करें।

 

गर्मी के कारण त्वचा पर चकत्ते हो जाना 

त्रिफला की राख शहद में मिलाकर लगाने से राहत मिलती है।

 

अन्न दोष एवं कब्ज 

भोजन के बाद त्रिफला चूर्ण लेने से अन्न के दोष तथा वात-पित्त-कफ से उत्पन्न रोग मिटते हैं।  और कब्जियत भी नहीं रहती है।

लू लगने पर घरेलू उपचार – Lu lagne ke lakshan

लू किसे कहते है?

गर्मी के दिनों में जो गर्म हवा चलती है खास तौर से मई जून के महीने में चलने वाली गर्म हवाओं को लू कहते है।
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लू क्यों लगती है?

गर्मी के दिनों में सूर्य की किरणें अत्यंत उष्ण (गर्म) हो जाती हैं। इनके संपर्क से हवा रुक्ष (सूखी) हो जाती है। जब हम गर्मी के दिनों में दोपहर के वक्त घर से बाहर जाते हैं तब यही उष्ण और रुक्ष हवा हमारे शरीर की नमी या आद्रता को सोख लेती है और हमें लू लग जाती है।

लू लगने के लक्षण क्या हैं?

लू लगने पर चेहरा लाल हो जाता है। लू लगने पर सांस लेने में कष्ट होने लगता है। लू लगने पर त्वचा शुष्क (सूखना) हो जाती है। लू लगने पर प्यास अधिक लगती है। लू लगने पर कभी-कभी सिर और गर्दन में पीड़ा होने लगती है। लू लगने पर कभी-कभी व्यक्ति बेहोश भी हो जाता है। लू से बचाव के तरीके? लू चलने के दिनों में पानी अधिक पीना चाहिए। लू से बचने के लिए घर से बाहर जाते समय कानों को कपड़े से ढक लेना चाहिए।
लू से बचने के लिए सूती वस्त्र पहनने चाहिए। लू से बचने के लिए दिन में दो बार नहाना चाहिए। प्याज और पुदीना लू लगने के खतरे से रक्षा करते हैं इनको अपने साथ रखना चाहिए एवं इनका सेवन करते रहना चाहिए। घर से बाहर जाने से पहले पानी या छाछ पी कर निकलने से लू नहीं लगती। लू से बचने के लिए नींबू का शरबत भी पिया जा सकता हैं यह भी हितकर होता है।

सर्दी जुकाम का घरेलू उपचार

सर्दी जुकाम को ठीक करने के घरेलु उपचार

सर्दी जुकाम का घरेलू उपचार

पहला प्रयोग

सर्दी जुकाम में 2 ग्राम पिसी हुई सोंठ दूध में उबालकर सेवन करना चाहिए।

 

दूसरा प्रयोग 

सर्दी जुकाम होने पर तुलसी के रस में अदरक का रस मिलाकर सेवन करने से सर्दी में लाभ होता है। मात्रा -10 मिलीलीटर तुलसी का रस, 15 मिलीलीटर अदरक का रस दोनों को मिलाकर सेवन करें।

 

तीसरा प्रयोग 

सर्दी जुकाम होने पर एक गिलास दूध में 2 से 10 ग्राम तक काली मिर्च और 1 से 5 ग्राम तक हल्दी उबालकर पीने से सर्दी जुकाम में लाभ होता है।

 

चौथा प्रयोग 

सोंठ जल

सर्दी जुकाम होने पर सोंठ जल तैयार करें। सोंठ का जल तैयार करने की विधि –

एक भिगोने में 1 किलो पानी भरकर गैस पर रखें। इस पानी में एक साबुत सोंठ की गांठ डालकर पानी को इतना उबालें कि वह आधा रह जाए। इस उबले हुए पानी को निथार कर पीने से सर्दी खांसी, सिर दर्द में काफी आराम मिलता है।

तत्काल कब्ज राहत – Kabj ka ilaj

कब्ज क्या है?

कब्ज के रोगी खान-पान में असयंम के कारण कब्ज का शिकार होते हैं। कब्ज से ही अनेक बीमारी होती हैं। भोजन के पश्चात जब हमें मल त्याग की क्रिया ठीक न हो अर्थात हमारा पेट साफ न हो तो उसे कब्जे कहते हैं।
तत्काल कब्ज राहत

 

 

कब्ज होने के दुष्परिणाम क्या हैं?

कब्ज पेट के सभी रोगों का मूल है। कब्ज रहने से हमें अनेक बीमारियां होती हैं जैसे-भूख कम लगना, अजीर्ण होना, अपच, खाना खाने में अरुचि होना, अफारा व पेट दर्द, सिर दर्द आदि रोग हो जाते हैं।

कब्ज किन कारणों से होता है?

कब्ज होने के कारण – बिना रेशेदार भोजन करना। खाना खाते ही तुरंत पानी पी लेना। खाना खाते समय भी ठंडे पानी का सेवन करना। सलाद न खाना। खाना जल्दी-जल्दी खाना। मैदे से बने पदार्थों का अधिक सेवन करना। रात को देर से भोजन करना। भोजन करने के तुरंत बाद ही सो जाना। बार-बार स्वाद के लिए बिना भूख के खाना।

कब्ज ठीक करने के उपाय एवं उपचार?

1. स्वाद की गुलामी स्वास्थ्य की घोर शत्रु है।
2. खान-पान को ठीक करके हमें अपने पेट को सदैव साफ रखना चाहिए।
3. रात को देर से कुछ भी ना खाएं भोजन करने के दो घंटे बाद तक ने सोए।
4. मैदे से बने पदार्थों का अधिक सेवन न करें।
5. चोकर युक्त आटे का सेवन करें अथवा आटा मोटा होना चाहिए।
6. भोजन के डेढ़ या दो घंटे के बाद खूब पके पपीते का सेवन करें।
7. भोजन के पश्चात छाछ का सेवन करें।
8. रेशेदार सब्जियां खाएं सलाद खाएं।
9. खाना चबा-चबा कर खाएं।
10. खाना खाने के एक घंटे बाद पानी पिए।
11. रात्रि में भोजन के पश्चात सोते समय दूध या पानी के साथ एक चम्मच त्रिफला चूर्ण का सेवन करने से कब्ज मिटता है।

पेट दर्द और गैस

पेट दर्द क्या है?

प्रत्येक रोगी आहार-विहार में अनियमितता के कारण पेट की बीमारी का शिकार है। वायु के प्रकोप के कारण पेट के फूलने एवं अपान वायु के निकलने के कारण पेट का तनाव बढ़ जाता है। जिससे बहुत दर्द होता है और चलना भी मुश्किल हो जाता है ऐसी स्थिति को हम पेट दर्द कहते हैं।
पेट दर्द और गैस
 

 

पेट दर्द क्यों होता है एवं इसके क्या कारण है?

पेट में दर्द होने के अनेक कारण हो सकते हैं।
1. खान पान समय पर न करना।
2. देर रात को या रात्रि में देर से भोजन करना।
3. भोजन करते ही तुरंत सो जाना।
4. मैदा से बने खाद्य पदार्थों का सेवन करना जैसे समोसा, भटूरे, ब्रेड, नूडल आदि एवं अधिक महीन या बारीक आटे का सेवन करना।
5. बासी भोजन करना।
6. बिना भूख लगे बिना पचे भोजन करना पहले से ही पेट में भोजन हो फिर भी कुछ ना कुछ ऐसे में खाते रहना ऐसा करने से पेट में दर्द होने लगता है।
7. भूख रोकने से अथवा भूख लगने पर भी ना खाने से पेट में दर्द होता है और सिर में चक्कर आते हैं।
8. पचने में भारी सब्जियों का सेवन करने से जैसे गोभी अरबी बैंगन भिंडी आदि के खाने से वात का प्रकोप बढ़ जाता है जिससे पेट में दर्द होने लगता है।

क्या पेट दर्द में अंकुरित चना खा सकते हैं?

पेट दर्द में अंकुरित चना नहीं खा सकते क्योंकि अंकुरित चना पचने में भारी होता है।

चावल खाने के बाद यदि पेट में दर्द हो तो क्या करें?

चावल खाने के बाद यदि पेट में दर्द हो तो 2 ग्राम सोंठ 1 ग्राम सेंधा नमक 1 ग्राम हींग पीसकर गुनगुने पानी के साथ लेने से पेट दर्द में आराम होता है।

पेट दर्द और गैस में क्या खाना चाहिए?

अगर किसी को पेट दर्द किसी विशेष पदार्थ के खाने पर होता है तो उस पदार्थ का सेवन ना करें। पेट दर्द में अजवाइन एवं काला नमक को बराबर मात्रा में मिलाकर अजवाइन को पीस लें। इस मिश्रण को एक चम्मच भर लें और गुनगुने या गर्म पानी के साथ लेने से पेट दर्द में आराम होता है।

गैस में क्या ले?

प्रातः काल एक ग्लास पानी में 20-25 ग्राम पुदीने का रस व 20-25 ग्राम शहद मिलाकर पीने से गैस की बीमारी में विशेष लाभ होता है।

अम्लता व सीने में जलन का उपचार?

अम्ल पित्त वाले व्यक्तियों के लिए खुली हवा में घूमना विशेष रूप से लाभदायक है। जिनको अधिक अम्ल बनता है वे व्यक्ति भोजन में कड़वे-मधुर व कसैले पदार्थों का सेवन विशेषकर करें।
कड़वा रस – अपक्व आहार बिना पचा भोजन का पाचन करता है।
कसैला रस – पित्त की बढ़ी हुई मात्रा को घटाता है।
मधुर रस – पित्त का शमन (शांत) करता है बढे हुए पित्त की मात्रा को कम करता है।

पुदीना

पुदीने का उपयोग अधिकतर चटनी या मसाले के रूप में किया जाता है।  पुदीना एक सुगंधित एवं उपयोगी औषधि है। यह अपच को मिटाता है। पुदीना खाने में स्वादिष्ट पचने में हलका तीक्ष्ण, तीखा, कड़वा, उल्टी मिटाने वाला, शक्ति बढ़ाने वाला, वायु नाशक, फेफड़ों में जमे हुए कफ को बाहर निकालने वाला, अरुचि, मंदाग्नि, अफारा, दस्त, खांसी, श्वास, निम्न रक्त, हैजा, अजीर्ण आदि को मिटाने वाला है।

पुदीने का रस पीने से खांसी, उल्टी, अतिसार, वायु व क्रीमी (कीड़े) का नाश होता है। व हैजा भी ठीक  होता है। पुदीने में रोग प्रतिकारक शक्ति उत्पन्न करने की अद्भुत क्षमता होती है एवं पाचक रसों को उत्पन्न करने की क्षमता होती है। अजवायन के सभी गुण पुदीने में पाए जाते हैं।

पुदीना

पुदीने के औषधीय प्रयोग

मंदाग्नि (भूख खुलकर न लगना)  पुदीने में विटामिन ए अधिक मात्रा में पाया जाता है। पुदीने में जठराग्नि को तीव्र करने वाले तत्व अधिक मात्रा में होते हैं। इसके सेवन से भूख खुलकर लगती है। पुदीना, तुलसी, काली मिर्च एवं अदरक का काढ़ा पीने से वायु दूर होती है और भूख खुलकर लगती है।

त्वचा विकार

दाद-खाज पर पुदीने का रस लगाने से बहुत लाभ होता है।

हिचकी 

पुदीने का प्रयोग हिचकी बंद करने के लिए भी करते हैं। हिचकी बंद न हो रही हो तो पुदीने के पत्ते चबाने पर हिचकी बंद हो जाती है अथवा नींबू के रस का उपयोग करके भी हिचकी बंद हो जाती है।

पेट दर्द 

पेट दर्द के लिए सूखा पुदीना व मिश्री समान मात्रा में मिलाएं दो चम्मच फंकी पानी के साथ सेवन करें इससे पेट दर्द ठीक होता है।

त्वचा विकार

दाद-खाज पर पुदीने का रस लगाने से बहुत लाभ होता है।

हिचकी 

पुदीने का प्रयोग हिचकी बंद करने के लिए भी करते हैं। हिचकी बंद न हो रही हो तो पुदीने के पत्ते चबाने पर हिचकी बंद हो जाती है अथवा नींबू के रस का उपयोग करके भी हिचकी बंद हो जाती है।

पेट दर्द 

पेट दर्द के लिए सूखा पुदीना व मिश्री समान मात्रा में मिलाएं दो चम्मच फंकी पानी के साथ सेवन करें इससे पेट दर्द ठीक होता है।

वायु एवं (कीड़े) कृमि 

पुदीने के दो चम्मच रस में एक चुटकी काला नमक डालकर पीने से गैस वायु एवं पेट के कृमि नष्ट होते हैं।

गैस 

पेट मैं गैस बनने पर सुबह एक गिलास पानी में 20 से 25 ग्राम पुदीने का रस व 20 से 25 ग्राम शहद मिलाकर पीने से गैस की बीमारी में विशेष लाभ होता है।

दाद 

पुदीने के रस में नींबू मिलाकर लगाने से दाद में काफी आराम मिलता है।

उल्टी-दस्त, हैजा 

पुदीने के रस में नींबू का रस मिलाकर पिलाने से उल्टी-दस्त व हैजा ठीक होता है। अथवा पुदीने का अर्क देने से भी लाभ मिलता है। पुदीने का अर्क 10 से 20 मिलीग्राम की मात्रा में सेवन करें।

मुख की दुर्गंध 

पुदीने के रस में पानी मिलाकर कुल्ले करने से मुंह की दुर्गंध ठीक हो जाती है।

तरबूज

तरबूज गर्मी के मौसम का फल है। तरबूज लगभग पूरे भारत में पाया जाता है। पका हुआ लाल गूदे वाला तरबूज स्वाद में मीठा या मधुर गुण में शीतल, पित्त एवं गर्मी का शमन करने वाला, पौष्टिकता एवं तृप्ति देने वाला, पेट साफ करने वाला, खुलकर पेशाब लाने वाला है।
तरबूज के बीजों का भी सेवन किया जाता है। तरबूज के बीज शरीर में स्निग्ध्ता बढ़ाने वाले, पौष्टिक, गर्मी का शमन करने वाले, दिमागी शक्ति बढ़ाने वाले, दुर्बलता मिटाने वाले, गर्मी की खांसी दूर करने वाले होते हैं। तरबूज के बीज का सेवन प्रतिदिन 10 ग्राम से 20 ग्राम तक कर सकते हैं। गर्मी के दिनों में दोपहर के भोजन के 2 या 3 घंटे बाद तरबूज खाना लाभदायक है। यदि तरबूज खाने के बाद पेट में कोई तकलीफ हो तो शहद या गुलकंद का सेवन करें।
तरबूज

तरबूज का औषधीय उपयोग

मंदाग्नि

तरबूज के गूदे पर काली मिर्च जीरा एवं नमक डालकर खाने से भूख खुलकर लगती है और पाचन शक्ति बढ़ती है।

शरीर पुष्टि

तरबूज के बीज की गिरी निकालकर चूर्ण बना लीजिए। एक बड़ा गिलास दूध से भरकर उसमें एक चम्मच तरबूज की गिरी का चूर्ण डालकर उबालिये। गर्म दूध में मिश्री मिलाइए ठंडा करके दूध को पी लीजिए इस दूध के प्रतिदिन सेवन से शरीर पुष्ट होता है।

पपीता

पपीता फरवरी-मार्च एवं मई से अक्टूबर तक के महीने में अधिक मात्रा में मिलने वाला फल है।

पपीता खाने के फायदे

 

पके हुए पपीते से मिलने वाले लाभ इस प्रकार हैं –

पका हुआ पपीता स्वाद में मधुर, पित्त दोष नाशक, पचने में भारी, गुण में गर्म, पेट साफ करने वाला, हृदय के लिए हितकारी, आंतों के कीड़ों को मिटाने में सहायक होता है। पका हुआ पपीता स्वाद में मधुर होता है। पका हुआ पपीता पित्त के दोषों का नाश करता है। पका हुआ पपीता पचने में भारी, गुण में गर्म होता है।

पका हुआ पपीता हृदय के लिए हितकारी होता है। पका हुआ पपीता आंतो के कीड़ों को मिटाने में सहायक होता है। पका हुआ पपीता वायु के दोषों का नाश करता है। पके हुए पपीते में विटामिन सी की भरपूर मात्रा होती है।

पके पपीते के सेवन से सूखा रोग ठीक होता है। खाना खाने के 1 घंटे बाद पके पपीते का सेवन करने से कब्ज ठीक होता है।पके पपीते के सेवन से अम्लपित्त आदि रोगों में लाभ होता है। पपीते के सेवन के बाद अजवाइन को चबाकर खाने से फोड़े-फुंसी, पसीने की दुर्गंध एवं पेट के कीड़े आदि का नाश होता है।

पपीते का औषधीय प्रयोग

दुबले व कमजोर बच्चों के लिए

दुबले पतले बच्चों को रोज उचित मात्रा में पका हुआ पपीता खिलाने से उनका शरीर मजबूत एवं तंदुरुस्त बनता है।

मंदाग्नि एवं अजीर्ण

पपीते की फांक पर नींबू, नमक और काली मिर्च डालकर रोज सुबह खाली पेट सेवन करने से मंदाग्नि, अरुचि तथा अजीर्ण में काफी लाभ मिलता है।

अनार खाने के फायदे – Anar ke fayde

मीठा अनार तीनों दोषों का शमन करने वाला तृप्ति प्रदान करने वाला कसैले रस वाला, बल प्रदान करने वाला, जलन व कमजोरी को दूर करने वाला है।
अनार खाने के फायदे

अनार से मिलने वाले लाभ

अनार खाने से पेट के कीड़ों का नाश होता है। मीठे अनार का सेवन हृदय को बल देने के लिए बहुत उपयोगी है।अनार का रस (पित्त शामक) पित्त को शांत करने वाला है। अनार के रस के सेवन से उल्टी बंद हो जाती है। अनार के सेवन से अरुचि, अतिसार, छाती की जलन व मन की व्याकुलता दूर होती है। अनार का रस फेफड़े, हृदय, आमाशय तथा आंतों के रोगों में लाभदायक होता है। अनार के सेवन से शरीर में शक्ति व स्फूर्ति का संचार होता है।

अनार का औषधी के रूप में उपयोग

गर्मी के रोग

गर्मियों में गर्मी के कारण सिरदर्द होने पर, लू लगने पर, आंखें लाल होने पर अनार का शरबत पीने से बहुत लाभ मिलता है।

पित्त प्रकोप

शरीर में पित्त की मात्रा बढ़ने पर ताजे अनार के दानों का रस निकालकर उसमें मिश्री मिलाकर पीने से हर प्रकार का पित्त प्रकोप शांत होता है।

अरुचि

भोजन के प्रति अरुचि होने पर अनार के रस में सेंधा नमक व शहद मिलाकर इसका सेवन करने से अरुचि मिटती है।

खांसी

खांसी होने पर अनार का छिलका मुंह में डालकर चूसने से साधारण खांसी में लाभ होता है।

कीड़े

छोटे बच्चों के पेट में अगर कीड़े हो तो उन्हें सुबह-शाम नियमित रूप से दो या तीन चम्मच अनार का रस पिलाने से कीड़े नष्ट हो जाते हैं।

खांसी के घरेलू उपाय

खांसी हो जाने पर शीतोपलादि चूर्ण को शहद के साथ मिलाकर दिन में तीन बार सेवन करें। मात्रा 1 ग्राम चूर्ण में आधा चम्मच शहद मिलाकर दिन में तीन बार सेवन करें। खांसी हो जाने पर चार से पांच लॉन्ग को घी में भूनकर तुलसी के पत्तों के साथ चबाने से सभी प्रकार की खांसी में लाभ होता है।

 

खांसी के घरेलू उपाय

 

खांसी में मुनक्का एवं मिश्री की डली को मुंह में रखकर चूसने से खांसी में बहुत लाभ मिलता है। सर्दी, जुकाम एवं खांसी में हल्दी नमक लगे हुए पीले चने, चने ताजे भुने होने चाहिए इनका सेवन सुबह के समय तथा रात को सोते समय करना चाहिए। मात्रा एक मुट्ठी चना सुबह सेवन करें और रात को भी इतनी ही मात्रा में सेवन करे। किंतु चने खाकर पानी न पिएं सर्दी खासी वाले मरीज के लिए यह बहुत सरल प्रयोग है।
विशेष ध्यान देने योग्य बात यह है कि सर्दी, खांसी, जुकाम हो जाने पर भोजन में घी, दूध, मिठाई व खट्टी चीजों का सेवन बंद कर देना चाहिए और चिकनाई युक्त पदार्थों का सेवन भी नहीं करना चाहिए।

पत्थर बेल के फायदे – Bel pathar ke fayde

वह बेल जो रोगों का नाश करें। पत्थर बेल के नियमित सेवन से शरीर सुडौल बनता है। पत्थर बेल की जड़ उसकी शाखाएं पत्ते, छाल और फल ये सभी औषधियां हैं। पत्थर बेल में हृदय को ताकत और दिमाग को ताजगी देने के साथ-साथ सात्विकता प्रदान करने का भी श्रेष्ठ गुण है।
पत्थर बेल के फायदे
यह स्निग्ध (मीठा) मुलायम और उष्ण होता है। कच्चे और पके पत्थर बेल के गुण तथा उससे होने वाले लाभ अलग-अलग प्रकार के होते हैं। कच्चे पत्थर बेल का सेवन करने से भूख खुलकर लगती है और पाचन शक्ति भी मजबूत होती है। कच्ची पत्थर बेल के सेवन से पेट के कीड़ों का नाश होता है।

पके हुए पत्थर बेल के गुण व लाभ

पका हुआ पत्थर बेल खाने में मीठा, स्वाद में कसैला, पचने में भारी तथा मीठा खाद्य पदार्थ होता है। पके पत्थर बेल को खाने से पेट ठीक होता है अर्थात पेट साफ हो जाता है।

पत्थर बेल के औषधीय लाभ

पेट में मरोड़ होने पर पके हुए पत्थर बेल का सेवन आंतो को ताकत देता है। एक पके पत्थर बेल के गूदे से बीज निकालकर सुबह-शाम सेवन करने से पेट में मरोड़ नहीं होती।

पेट व छाती की जलन

200 मिलीलीटर पानी में 25 ग्राम एक पके बेल पत्थर का गूदा लेकर उसमें 25 ग्राम मिश्री मिलाकर उसका शर्बत बनाकर पीने से छाती, पेट, आँख की जलन एवं पैर के तलवों की गर्मी में राहत मिलती है।

पाचन के लिए

पत्थर बेल में पाचक तत्व भरपूर मात्रा में होते हैं। पाचन के लिए पके हुए पत्थर बेल का गूदा निकालकर उसे खूब सुखा लीजिए फिर इसको पीसकर चूर्ण बनाएं। आवश्यकता पड़ने पर इस चूर्ण को 2 ग्राम से 5 ग्राम तक की मात्रा में पानी के साथ सेवन करने से पाचन ठीक होता है।

जौ के फायदे, जौ के औषधीय गुण

जौ क्या होता है?

जौ का उपयोग काफी लंबे समय से होता चला आ रहा है। जौ एक प्रकार का अनाज है। यह गेहूं की अपेक्षा हल्का अनाज होता है।

जौ
जौ के फायदे

जौ का सत्तू कैसे बनाया जाता है?

जौ को भूनकर पीसकर उसके आटे में थोड़ा सैंदा नमक और पानी मिलाकर सत्तू बनाया जाता है और पीया जाता है। नमक की जगह गुड़ का भी उपयोग किया जा सकता है। सत्तू में घी और चीनी मिलाकर भी खाया जाता है।

जौ का उपयोग कब अधिक किया जाता है?

गर्मी की ऋतु में भूख प्यास शांत करने के लिए जौ के सत्तू का उपयोग अधिक होता है।

गर्मी में जौ के सत्तू का क्या महत्व होता है?

गर्मी की ऋतु में सूर्य की किरणें अत्यंत उष्ण (गर्म) होती हैं। गर्मी की ऋतु में प्राणियों के शरीर का जलीयांश (जल की मात्रा) कम हो जाता है जिससे प्यास ज्यादा लगती है इसलिए इस ऋतु में जौ का सत्तू पीना बहुत हितकारी है। गर्मी की ऋतू में जौ का सत्तू हमारे शरीर को ठंडक प्रदान करता है।

जौ के सत्तू के क्या गुण होते हैं?

जौ का सत्तू ठंडा अग्नि प्रदीपक (गर्मी शांत करने वाला) होता है। जौ का सत्तू कब्ज दूर करता है। जौ का सत्तू कफ एवं पित्त को दूर करता है। जौ का सत्तू रुक्षता और मल को दूर (पेट साफ़) करता है।

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नींबू के फायदे, नींबू का उपयोग

गर्मी में नींबू का उपयोग किन किन रूपों में किया जाता है?

गर्मी के मौसम में नींबू का शरबत बनाकर पिया जाता है जैसे शिकंजी या नींबू पानी। नींबू का रस स्वादिष्ट व पाचक होने के कारण स्वास्थ्य के लिए अत्यंत उपयोगी होता है।
नींबू
नींबू के फायदे

नींबू के क्या क्या गुण होते हैं?

गुणों की दृष्टि से नींबू बहुत अधिक लाभकारी होता है खून की अम्लता को दूर करने का विशिष्ट गुण नींबू रखता है। नींबू की खटाई में ठंडक उत्पन्न करने का विशिष्ट गुण होता है जो हमें गर्मी से बचाता है। नींबू में विटामिन सी अधिक मात्रा में पाया जाता है अतः यह खून में पित्त की मात्रा के बढ़ने को कम करता है व स्कर्वी रोग आदि मे अत्यंत लाभदायक होता है।

नींबू का सेवन किन किन परिस्थितियों में नहीं किया जाता है?

नींबू का सेवन जोड़ों के दर्द में नहीं किया जाता है। नींबू का सेवन शरीर में कहीं भी सूजन होने पर नहीं किया जाता है। नींबू का सेवन यदि किसी व्यक्ति को बुखार के साथ खासी जुखाम या फेफड़ों में बलगम जमा हो तो भी नहीं किया जाता है। नींबू का सेवन सफेद दाग के रोगी को भी नहीं करना चाहिए।

नींबू का औषधि के रूप में प्रयोग किन परिस्थितियों में किया जा सकता है?

मुंह सूखना

बुखार की अवस्था में गर्मी के कारण मुंह के भीतर लार उत्पन्न करने वाली ग्रंथियां जब लार उत्पन्न करना बंद कर देती हैं और मुंह सूखने लगता है तब नींबू का रस पीने से ये ग्रंथियां सक्रिय हो जाती है।

अपच अरुचि

नींबू के रस में मिश्री और काली मिर्च का एक चुटकी चूर्ण डालकर शर्बत बनाकर पीने से जठराग्नि तीव्र होती है। जिससे भोजन के प्रति रुचि उत्पन्न होती है व आहार का पाचन होता है।

पेट दर्द मंदाग्नि व भूख ना लगना

एक गिलास पानी में दो चम्मच नींबू का रस एक चम्मच अदरक का रस व मिश्री डालकर पीने से हर प्रकार का पेट दर्द दूर हो जाता है। जठराग्नि तीव्र होती है व भूख खुलकर लगती है।

मोटापा और कब्ज

एक गिलास गुनगुने पानी में एक साबुत नींबू का रस एवं दो तीन चम्मच शहद डालकर पीने से शरीर की अनावश्यक चर्बी कम होती है और कब्ज भी खत्म होता है।

त्वचा रोग

नींबू के रस में नारियल का तेल मिलाकर शरीर पर उसकी मालिश करने से त्वचा की शुष्कता खुजली आदि त्वचा के रोगों में लाभ होता है।
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दांतों का इलाज – Dant ka dard

दांत जल्दी गिरने के क्या कारण होते हैं?

खूब ठंडा पानी पीने से या ठंडे पदार्थों का सेवन करने से दांत जल्दी गिर जाते हैं। जब हम ठन्डे पदार्थो के सेवन के तुरंत बाद गर्म पदार्थो का सेवन करते है या गर्म पदार्थो के सेवन के तुरंत बाद ठन्डे पदार्थो का सेवन करते है तो ऐसा करने से हमारे दांत कमजोर हो जाते है।
दांतों का इलाज
 

दांतो को मजबूत कैसे किया जा सकता है?

दांतो की मजबूती के लिए आंवले के चूर्ण को पानी में उबाल कर उस पानी के कुल्ले करने से दांत मजबूत व स्वच्छ (साफ़) होते हैं।

दांतों की चमक के लिए क्या करें?

दांतों की चमक के लिए तेजपात के पत्तों को खूब महीन पीस लें और हर तीसरे दिन के अंतराल पर दिन में एक बार इसके चूर्ण से मंजन करने से दांत दूध जैसे सफ़ेद हो जाएंगे।
 

उल्टी रोकने के उपाय – Ulti ka ilaj

उल्टी क्यों लगती है?

गलत खान-पान की पद्धति से हमें उल्टी लग जाती है। बिना भूख के खा लेने से अथवा यदि पेट में पहला आहार पचा न हो और हम इसी दौरान दूसरा आहार ग्रहण करें तो पहले आहार का कच्चा रस इसके साथ मिलकर दोष उत्पन्न कर देता है जिससे हमें उल्टी हो जाती है।
कभी-कभी गैस की तकलीफ व अपच के कारण भी उल्टी हो जाती है। गलत खान-पान से भी यह समस्या पैदा होती है जैसे तरबूज खा कर पानी पी लेना, ककड़ी खीरा तरबूज खा कर पानी का सेवन करने से हमें उल्टी लग जाती है।
उल्टी
 

उल्टी लगने पर क्या करें?

पहला प्रयोग

उल्टी लगने पर अदरक के रस में मिश्री मिलाकर पीने से उल्टी होना जी मिचलाना बंद हो जाता है। मात्रा एक चम्मच अदरक के रस में आधा चम्मच मिश्री मिलाकर तीन-तीन घंटे के अंतर से एक-एक चम्मच सेवन करें।

दूसरा प्रयोग

अदरक और प्याज का रस समान मात्रा में मिलाकर तीन-तीन घंटे के अंतर से एक-एक चम्मच सेवन करें।

तीसरा प्रयोग

हरे धनिया की पत्ती का रस थोड़ी-थोड़ी देर के अंतराल में पीने से उल्टी बंद होने लगती है।

उल्टी हो जाए तो क्या खाएं?

बार-बार उल्टी होने से पेट की आंते कमजोर हो जाती हैं ऐसी स्थिति में आप खिचड़ी और दही का सेवन करें अगर कोई व्यक्ति दही न खा सके तो खिचड़ी में नींबू निचोड़ कर खाएं तथा स्वच्छ पानी पियें हो सके तो पानी उबालकर पिए।

उल्टी जैसा मन हो तो क्या करें?

छोटी हरी इलायची एक या दो इसके साथ एक लॉन्ग दोनों को मुंह में रखें इनका रस धीरे-धीरे पेट में जाने से काफी लाभ मिलेगा।

गैस के लिए क्या करें?

आधा चम्मच अदरक के रस में हींग और काला नमक मिलाकर खाना खाने के बाद सेवन करें इससे गैस की तकलीफ दूर होगी।
 

आम के फायदे, आम का औषधीय उपयोग

आम गर्मी की ऋतु का फल है। आम मई, जून, जुलाई और अगस्त के महीनों में भरपूर मात्रा में मिलने वाला फल है। आम को फलों का राजा भी कहते हैं। पका हुआ आम दुबले-पतले बच्चो, बूढ़े व्यक्तियों को व कमजोर लोगों को पुष्ट बनाने के लिए सर्वोत्तम खाद्य फल है।
पका हुआ आम खाने से शरीर में सातों धातुओं की वृद्धि होती है।पका हुआ आम चूसकर खाने से आंखों को लाभ होता है। पका आम खाने से दिमागी कमजोरी दूर होती है। पका हुआ आम उत्तम प्रकार का हृदय पोषक है। पके हुए आम के खाने से आलस्य भी दूर होता है।
आम

आम का औषधीय उपयोग

पेट के रोग व गैस

आम के रस में घी और सोंठ डालकर सेवन करने से जठराग्नि तीव्र होती है। शरीर का बल बढ़ता है और गैस में पित्तदोष का नाश होता है।

पुष्टि व रूप निखार

सुबह या शाम के समय आम को चूसकर उसके बाद आधा चम्मच अदरक का रस या अदरक का टुकड़ा सेवन करें और इसके 2 घंटे बाद दूध पीने से शारीरिक बल बढ़ता है। रूप में निखार आता है और शरीर पोस्ट बनता है।

बूढ़े व्यक्तियों के लिए विशेष पुष्टि दायक प्रयोग

सुबह खाली पेट 250 ग्राम पके आम का रस 50 ग्राम शहद और 10 ग्राम अदरक का रस मिलाकर सेवन करें इसके सेवन के 2 घंटे बाद एक गिलास दूध पिए 4 घंटे तक कुछ न खाएं। यह प्रयोग बुढ़ापे को दूर करने वाला शरीर को बल प्रदान करने वाला व जीवनी शक्ति बढ़ाने वाला है।
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फालसा – falsa फल

गर्मी के दिनों में फालसा एक उत्तम पौष्टिक फल है। फालसा शरीर को निरोगी एवं हष्टपुष्ट बनाता है।  वैज्ञानिक दृष्टि से फालसे में विटामिन सी एवं केरोटीन तत्व भरपूर मात्रा में पाया जाता है।

फालसा स्निग्ध, चिकना, मधुर, खट्टा और तिक्त होता है। फालसे के पके फल स्वाद में मधुर, स्वादिष्ट, पचने में हल्के, गर्मी शांत करने वाले, उल्टी मिटाने वाले, दस्त में सहायक व पेट के लिए शक्ति दायक एवं हृदय के लिए अत्यंत लाभदायक हैं।

फालसा रक्त पित्त नाशक, वात शामक, कफ को हरने वाला हिचकी व श्वास की तकलीफ में भी लाभकारी है। गर्मियों के दिनों में शरीर में होने वाली गर्मी, जलन तथा पेट एवं दिमाग की कमजोरी फालसे के सेवन से दूर होती है।

फालसे के औषधीय उपचार

पेट का दर्द

पेट दर्द के लिए अजवायन को सेंककर 3 ग्राम की मात्रा लेकर 25 या 30 ग्राम फालसे के रस में मिलाकर हल्का सा गर्म करके पीने से पेट दर्द में आराम मिलता है।

पित्त विकार या पित्तदोष

गर्मी के कारण होने वाले रोग जैसे आंखों की जलन, पेशाब की जलन, पेट की जलन, खट्टी डकार आदि की परेशानी में फालसे के रस का शर्बत बनाकर पीने से पित्त विकार मिटते हैं और अधिक गर्मी से राहत मिलती है।

पेट की कमजोरी

पके हुए फालसे के रस में गुलाब जल एवं मिश्री मिलाकर रोज पीने से पेट की कमजोरी दूर होती है और उल्टी, पेट दर्द, जी मिचलाना आदि परेशानी दूर होती है एवं रक्त दोष भी ठीक होता है।

दिमाग की कमजोरी कुछ दिनों तक नाश्ते के स्थान पर फालसे का रस उपयुक्त मात्रा में पीने से दिमाग की कमजोरी व सुस्ती दूर होती है। शरीर में फुर्ती व शक्ति का संचार होता है।

श्वास, हिचकी व कफ दोष

कफ दोष से होने वाली परेशानी में सर्दी, श्वास व हिचकी में फालसे का रस हल्का गर्म करके उसमें थोड़ा अदरक का रस व सेंधा नमक डालकर पीने से कफ बाहर निकल जाता है तथा सर्दी, श्वास की तकलीफ व हिचकी मिट जाती है।